Thursday, July 22, 2010

बौद्ध संस्कृति का केंद्र लेह लद्दाख

भारतीय पर्यटन स्थलों में कश्मीर जितना प्रसिद्ध है, लद्दाख उतना ही अनजान और रहस्यमय है। जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन मुख्य भौगोलिक क्षेत्र हैं- जम्मू, कश्मीर और लद्दाख। इसके दो प्रमुख जिले हैं- करगिल एवं लेह। करगिल से सभी परिचित हैं, लेकिन लेह के बारे में बहुत कम जानकारी है लोगों को। बौद्ध धर्म एवं संस्कृति का प्रमुख केंद्र लेह हाल ही में 'सिंधु दर्शन' उत्सव के कारण चर्चा में आया है।
लेह पर्यटकों के लिए स्वर्ग है। यह धार्मिक व्यक्तियों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र तथा खोजी व्यक्तियों के लिए अपार संभावना का केंद्र है। भारत, चीन तथा पाकिस्तान की सीमाओं की मिलन स्थली भी यहीं है। इसलिए सामरिक दृष्टि से यह संवेदनशील भी है।

कैसे पहुंचें लेह
लेह पहुंचने के दो प्रमुख सड़क मार्ग हैं, जो जून से अक्टूबर तक ही खुले रहते हैं। जम्मू-श्रीनगर-लेह राजमार्ग भारत की सामरिक महत्व की सड़क है। यह 625 किलोमीटर लंबी है। जम्मू से श्रीनगर, फिर सोनमर्ग, जोजिला दर्रा, द्रास, मश्कोह, बटालिक, करगिल, लामायुरू तथा निम्मू इस राजमार्ग के आसपास स्थित हैं। इस सड़क पर यात्रा करना ही अपने आप में एक यादगार अनुभव है। टेढ़ी-मेढ़ी सड़क, बर्फीले पर्वत, गहरी खाई, जोजिला दर्रा, कारगिल, सुरूवेली सब कुछ जन्नत का नजारा है। दूसरा मार्ग मनाली से लेह तक 473 किलोमीटर लंबा है। यह भी चार माह खुला रहने वाला रोमांचक मार्ग है। इस मार्ग पर रोहतांग व तकलांगला दर्रा आता है। आगे सरचू, कारू तथा लेह तक जाने वाला यह मार्ग सुंदरता से मंत्रमुग्ध कर देता है।

लेह पहुंचने के लिए इन मार्गों से तीन दिन का समय लगता है। दो रातें रास्ते में बितानी पड़ती हैं। हवाई यात्रा सुगम लेकिन मौसम की मर्जी पर निर्भर है। चंडीगढ़ से सप्ताह में एक दिन, जम्मू से दो दिन तथा दिल्ली से सप्ताह में पांच दिन विमान सेवा उपलब्ध है। पर्यटकों के लिए लेह यात्रा करने का उत्तम समय मध्य जून से अक्टूबर तक है। इस समय सड़क मार्ग भी चलते रहते हैं तथा तापमान 8 से 25 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। सर्दियों में यहां का तापमान शून्य से 5 से 50 डिग्री नीचे तक पहुंच जाता है।

लेह का इतिहास
लेह कभी लद्दाखी नरेश तस्सेपल नाम्बियाल के कब्जे में था। जनरल जोरावरसिंह ने 1846 में इसे काश्मीर राज्य के अधीन मिलाया, तब से यह जम्मू-काश्मीर का भाग है। लेह का पश्चिमी क्षेत्र पाक सीमा से लगा है तथा यहीं सियाचिन ग्लेशियर है, जो जनसाधारण के लिए निषिद्ध क्षेत्र है। पूर्वी भाग चीन सीमा से लगा है। लद्दाख क्षेत्र बौद्ध लामाओं की साधना स्थली है। सालभर पर्वतीय शिखर बर्फ से ढके रहते हैं जबकि मैदानी भाग रेगिस्तान है। सुंदरता, रहस्य, धर्म एवं विचित्र शांति का यह क्षेत्र पर्यटकों को मोह लेता है।

लेह प्रसिद्ध भारतीय नदी सिंधु के किनारे है। इंडस या सिंधु नदी गर्मियों में इस क्षेत्र के सौंदर्य में चार चांद लगा देती हैं। सिंधु में आगे निम्मू घाटी में जान्सकार नदी आ मिलती है। इन दो नदियों के मिलन के सौंदर्य को शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता।

बौद्ध मठ और महल
पर्यटकों के लिए इस क्षेत्र का मुख्य आकर्षण बौद्ध मठ तथा नाम्बियाल नरेशों तथा मठों के महल हैं। लेह से 70 किलोमीटर के अर्द्धव्यास का एक गोला बनाया जाए तो लद्दाख के सभी महत्वपूर्ण मठ व महल इसमें आ जाते हैं। लेह से 126 किलोमीटर दूरी पर लामायुरू नामक स्थल है। यह प्रसिद्ध बौद्ध मठ है। इसका मार्ग सिंधु-जान्सकार के किनारे-किनारे होकर जाता है।
लेह से लामायुरू मार्ग पर प्रसिद्ध व प्राचीन बौद्ध मठ आलची, लिकिर तथा फयांग आता है। ये सभी मठ दर्शनीय हैं। सिंधु का किनारा, पहाड़ों पर बने मठ, शरीर को चुभती ठंडक बहुत रोमांचक लगता है। इसी मार्ग पर प्रसिद्ध निम्मू घाटी तथा मैग्नेटिक हिल है। लेह से निम्मू घाटी मार्ग पर एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा है- गुरुद्वारा 'पत्थर साहेब।'
यह गुरुद्वारा गुरु नानकदेवजी के चमत्कारिक व्यक्तित्व से जुड़ा है। सेना इसका संचालन करती है। यहां गुरु नानकदेवजी को नानकलामा के नाम से जाना जाता है। लेह-मनाली मार्ग पर एक जगह है कारू। यहां सिंधु नदी मैदानी भाग में आती है। इसी मार्ग पर शे महल तथा मठ, थिकसे मठ तथा सिंधु के दूसरे किनारे पर हेमिस मठ हैं। ये सभी मठ बहुत ही महत्वपूर्ण तथा लद्दाखी धार्मिक जीवन का आधार हैं। हेमिस व थिकसे मठ में भगवान बुद्ध की सुंदर मूर्तियां हैं। महल स्थानीय भवन कला के उत्तम उदाहरण हैं।

लेह के अन्य बौद्ध मठों में जापान द्वारा स्थापित शांति स्तूप, स्टाकना मठ, शंकर मठ, माशो तथा स्टोक मठ व पैलेस भी महत्वपूर्ण हैं। ये सभी लेह के आसपास हैं। स्टोक पैलेस में स्टाकना राजाओं की बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रहालय भी है। लेह विमानतल के पास एक प्रसिद्ध मठ है 'स्पितुक मठ'। यह बौद्धों के साथ हिन्‍दुओं व सिखों की आस्था का भी केंद्र है। इस मठ के ऊपरी भाग में भगवती तारा का मंदिर है। मूर्ति सालभर कपड़े से ढंकी रहती है। सिर्फ जनवरी में दो दिन आवरण हटता है। माना जाता है कि तारा की आराधना भगवान बुद्ध करते थे। हिन्‍दुओं के लिए सिद्धपीठ काली का मंदिर है। लद्दाखी जनता के लिए यह देवी पालदन लामो है। लद्दाख के सभी मठ ध्यान, साधना, आध्यात्मिक शक्ति तथा शांति के केंद्र हैं। इन मठों की पूजा व पूजा प्रणाली रहस्यात्मक है। इन मठों की चित्रकारी व मनोहारी रंग पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।

Monday, July 19, 2010

प्रकृति का अदभुत सौंदर्य है फूलों की घाटी

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी १० किमी लंबे और २ किमी चौड़े क्षेत्र में फैली है। यह समुद्र तल से 5091 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। फूलों की घाटी चारों ओर फूलों से भरी होती है। जहां तक नजर जाती है, रंग-बिरंगे फूलों की सुंदरता आंखों और मन को असीम सूकुन देती है। वहीं शांति और आनंद महसूस होता है, जो अध्यात्मिक या तीर्थ यात्रा द्वारा मिलता है। फूलों की घाटी एक बड़े फूलों के बाग की तरह दिखाई देती है। यहां पर बर्फ के पिघलने के बाद जून से लेकर अगस्त के महीने में अलग-अलग रंगों के फूलों की भरमार देखी जाती है। जैसे जून में सफेद फूल, जुलाई में लाल फूल और अगस्त में पीले फूल अधिक दिखाई देते हैं। इन फूलों के बीच दूसरे रंगों के फूल से ऐसा मनोरम दृश्य बनता है, जैसे ईश्‍वर ने खुद अपने हाथों से रंग-बिरंगी रंगोली बनाई हो। फूलों की घाटी का पूर्ण रूप देखने के लिए जुलाई-अगस्त ही सबसे अच्छा होता है। फूलों की घाटी में फैली फूलों की सुंदरता के साथ उनकी सुगंध, उन पर मंडराती तितलियां, भंवरे, पक्षियों की चहचहाहट घाटी को नई ऊर्जा, उमंग और उल्लास से भर देती हैं। फूलों की घाटी में लगभग 300 तरह के फूलों की प्रजातियां पाई जाती हैं। अनेक जंगली प्राणियों की जातियां भी यहां देखी जा सकती हैं। इनमें हिरण और हिमालयी भालू प्रसिद्ध हैं।
इस घाटी के एक तरफ पर्वत चोटियां हैं, जहां से पुष्पावती नदी बहती है। नर पर्वत फूलों की घाटी को बद्रीनाथ की घाटी से अलग करता है। ऊंचे पर्वतों से निकलती अनेक जलधाराएं फूलों की घाटी से दिखाई देती हैं। ये जलधाराएं पुष्पावती नदी में आकर मिल जाती हैं। फूलों की घाटी चार महीने के लिए खुली रहती है। जून से लेकर सितम्बर का समय सबसे अच्छा होता है। बाकी समय बर्फबारी और ठंड के कारण फूलों की सुंदरता नहीं देखी जा सकती है। लेकिन फूलों से रहित बर्फ से ढंकी घाटी भी बहुत ही मनोरम दिखाई देती है।

कैसे पहुंचें फूलों की घाटी
फूलों की घाटी भारत के उत्तरांचल प्रदेश के ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। यहां आने के दो रास्ते हैं- एक रास्ता ऋषिकेश से श्रीनगर, कर्णप्रयाग, जोशीमठ होते हुए गोविंदघाट का 270 किमी लंबा मार्ग। इस मार्ग में अनेक पवित्र नदियों अलकनंदा, भगीरथी, पिंडर, मंदाकिनी के दर्शन होते हैं। दूसरा रास्ता हल्द्वानी से रानीखेत, कर्णप्रयाग, जोशीमठ होते हुए गोविंदघाट का 332 किमी लंबा है।
ऋषिकेश से आगे जोशीमठ से ही फूलों की घाटी की यात्रा शुरू होती है। जोशीमठ से लगभग 20 किमी आगे गोविन्दघाट है। इस स्थान से आगे लगभग 18-19 किमी पैदल मार्ग है। इस मार्ग में पुलना, भ्यूडांर, घाघरिया होकर फूलों की घाटी में पहुंचा जा सकता है। फूलों की घाटी के लिए सबसे अच्छा मौसम जून से लेकर अक्टूबर तक माना जाता है। इसके पूर्व और बाद में हिमपात और बर्फ पिघलने से मौसम अनुकूल नहीं रहता है। जुलाई और अगस्त में यहां फूलों की बहार दिखाई देती है। सितंबर में कम हो जाती है। सितंबर में ब्रह्मकमल की दुर्लभ प्रजाति भी दिखाई देती है।

फूलों की घाटी 'हर की दून'

फूलों की घाटी का नाम तो आपने सुना ही होगा। जी हां चमोली जनपद की प्रसिद्ध तीर्थ स्थली बद्रीनाथ धाम के पास गंधमादन पर्वत पर स्थित फूलों की घाटी या वैली ऑफ फ्लावर्स। इतनी ही सुंदर पर अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध फूलों की एक और घाटी उत्तराखंड राज्य में उत्तरकाशी जनपद के मौरी विकास खंड स्थित टांस घाटी में है जो हर की दून के नाम से पर्यटकों के बीच लोकप्रिय होती जा रही है। हर की दून जाने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग हरिद्वार से ऋषिकेश, नरेन्द्र नगर, चंबा, धरासू, बडकोट, नैनबाग से पुरौला तक और दूसरा देहरादून से मसूरी, कैंप्टी फाल, नौगांव, नैनबाग से पुरौला तक जाता है। पुरौला सुंदर पहाड़ी कस्बा है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा बड़ा कटोरा जैसा लगता है। बस्ती के चारों ओर धान के खेत, फिर चीड़ के वृक्ष और उनके ऊपर से झांकती पर्वत श्रृखलाएं पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।


पुरौला से आगे है सांखरी जोहर की दून का बेस कैंप है। यहां तक बसें और टैक्सियां आती हैं। इसके बाद शुरू होती है लगभग 35 किमी. की ट्रैकिंग यानी पद यात्रा। यह खांई बद्यान क्षेत्र कहलाता है और यहां के सीधे-सादे निवासी अब भी आधुनिक सुख-सुविधाओं से वंचित हैं। सांखरी में आपको पोर्टर और गाइड मिल जाएंगे और आप रात्रि विश्राम के बाद सुबह अपनी रोमांचक यात्रा शुरू कर सकते हैं।
सांखरी समुद्रतल से 1700 मीटर की ऊंचाई पर है और यहीं से प्रारंभ होता है गोविंद पशु विहार का क्षेत्र, जिसमें प्रवेश करने के लिए वन विभाग की अनुमति लेनी पडती है। सूपिन नदी को पार करते ही आप स्वप्न लोक में पहुंच जाते हैं। चीड, सुरमई, बंाझ, बुरांस के घने जंगल और सूपिन नदी के किनारे-किनारे वन्य जीव-जंतुओं को निहारते 12 किमी. का सफर तय करके आप 1900 मीटर की ऊंचाई वाले कस्बे तालुका पहुंचते है। तब थोडा विश्राम का मन करने लगता है। चाहें तो यहां रात्रि विश्राम भी कर सकते हैं, गढवाल मंडल पर्यटन निगम के विश्राम गृह में जिसकी बुकिंग हरिद्वार से ही हो जाती है। तालुका से सवेरे थोडा जल्दी निकलना पडेगा क्योंकि अगला पडाव है ओसला गांव जो लगभग 13 किलोमीटर की पद यात्रा के बाद आता है। सूपिन नदी ही आपकी मार्ग दर्शक रहेगी और पथरीली पगडंडियां कई बार पहाडी झरनों के बीच से आपको ले जाएंगी जहां आपको ट्रैकिंग शूज आपको उतारने पड सकते हैं। यहां से देवदार के जंगल शुरू होते हैं। रई, पुनेर, खर्सो और मोरू के पेडों पर मोनाल, मैना और जंगली मुर्गियां आपको कैमरा निकालने के लिए विवश कर देंगी। बीच में एक छोटा सा गांव पडेगा गंगाड जहां की लकडी के बने सुंदर छोटे-छोटे घर आपका मन मोह लेंगे। यहां आप चाय पी सकते हैं जो आपको तरोताजा कर देगी और आप शाम ढलने से पहले ही ओसला पहुंच जाएंगे। ओसला की समुद्र तल से ऊंचाई है लगभग 2800 मीटर। यहां रात्रि विश्राम की सुविधाएं हैं। प्रात: सूपिन नदी को पार लगभग 200 मीटर की खडी चढाई चढ कर आप बुग्यालों में पहुंच जाते हैं। सूपिन का साथ यहीं तक है। दूर तक फैले हरे घास के मैदानों में हवा में झूमते लहराते रंग बिरंगे फूलों की छटा देख कर लगता है जैसे आप किसी और लोक में आ गए हैं। बर्फीले पर्वतों की चोटियां इतने पास लगती हैं मानो आप हाथ बढा कर छू लेंगे। नीचे देवदार के जंगल और दूर तक दिखती टेढी-मेढी सूपिन नदी को अलविदा कर फूलों के गलीचों, दलदलों जमीन पर बने पथरीले रास्तों पर कूदते-फांदते बंदर पुंछ, स्वर्गरोहिणी और ज्यूधांर ग्लेशियर से घिरी फूलों की घाटी में पहुंचते ही मन प्रफुल्लित हो जाता है। ओसला से यहां की दूरी लगभग 10 किमी है। सारा मार्ग बहुत ही मनोहर है। पहाडी ढलानों पर दूर तक एक ही रंग के फूलों की कई चादर। बीच-बीच में चट्टानों और कहीं कहीं भोजपत्र के पेड। इन्हीं भोज वृक्षों की ढाल पर हमारे ऋषि-मुनियों ने वेद, उपनिषद और आरण्यकों की रचनाएं लिखी थी।

हर की दून समुद्रतल से लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई पर है। रात्रि विश्राम के लिए विश्राम गृह हैं। रात्रि में जब ग्लेशियर टूटते हैं तो लगता है मानों भगवान शंकर का डमरू बज रहा है। रंग बिरंगे फूलों के गलीचे, चांदी सी चमकती नदियां और चारों ओर बर्फीली चोटियां.. क्या स्वर्ग की परिकल्पना इससे अलग हो सकती है?
खास बातें द्वहर की दून का ट्रैक बहुत कठिन नहीं, इसके लिए ज्यादा अभ्यास की जरूरत नहीं पडती। शरीर मौसम व ऊंचाई के अनुकूल हो तो अच्छी सेहत वाले इसे बिना किसी खास तकलीफ के कर सकते हैं। द्व21 हजार फुट की ऊंचाई वाली स्वर्गारोहिणी चोटी के लिए बेस कैंप के तौर पर भी हर की दून का इस्तेमाल किया जाता है। द्वहर की दून के लिए यूथ हॉस्टल जैसी कई संस्थाएं हर साल ट्रैकिंग अभियान चलती हैं। आप चाहें तो अपने स्तर पर भी वहां जा सकते हैं। साखंरी में गाइड व पोर्टर मिल जाएंगे। द्वयहां जाने का सर्वोत्तम समय अप्रैल से अक्टूबर के बीच है। रास्ते में कई जगहों पर (यहां तक की हर की दून में भी) गढवाल मंडल विकास निगम के रेस्टहाउस मिल जाएंगे। लेकिन इनके लिए बुकिंग पहले करा लें। देहरादून या ऋषिकेश, कहीं से भी पुरौला-सांखरी के लिए सडक मार्ग का सफर शुरू किया जा सकता है।